वह अपने कांपते हाथो से खिड़की के बगल में बैठ कुछ लिख रही थी. थोड़ा सा लिखने के बाद एक गहरी सांस ले कर वो बाहर डूबते सूरज को देखने लगी. बहुत सालो पहले भी वो घर का सारा काम ख़तम कर ऐसे ही खिड़की के बगल में बैठ जाती थी और अपनी टिमटिमाती आँखों से बाहर देखती थी. पर समय के साथ उसकी टिमटिमाती आँखों पर मोतियाबिंद की एक परत जम चुकी थी.
उसे कुछ याद आता है, वो बहुत मुशक्कत से, दीवार के सहारे हांफते हांफते कड़ी होती है और लडखडाती हुई रसोई की तरफ चल देती है. वहां एक दो डिब्बो को इधर उधर सरकती है और फिर अचानक रुक के सोचने लगती है की वो वहां क्यों आई थी. परेशान हो कर वो रसोई का प्लात्फोर्म पकड़ थोड़ी देर वही खड़ी रहती है और फिर धीमे से वहीँ खिड़की के पास आ कर बैठ जाती है.बाहर लाल हो चुके आसमान में सूरज को पेड़ के पीछे छुपता देख, वो भी कही वो भी कही पुराने दिनों में खो जाती है.
तब यही छोटा सा घर कितना भरा भरा लगता था. कितनी व्यस्त रहती थी वो दिनभर. कभी शब्बो को खाना देना था तो कभी उसे तैयार करना; कभी उसे नहलाना था तो कभी सुलाना और इन सब के साथ ही रोज़ थोड़ी बहुत सिलाई करना हर हफ्ते बाज़ार जाना और पता नहीं क्या क्या. कभी कभी तो वो इतनी व्यस्तता से तंगा ही जाता थी. पर अब तो सिर्फ सन्नाटा है, कुछ है ही नहीं करने को.
जब धीरे धीरे शब्बो बड़ी होने लगी तब उसके स्कूल से आने का इंतज़ार, फिर कॉलेज से आने का. उसने और किया ही क्या था, बस इंतज़ार ही तो किया था सारी ज़िन्दगी और अब भी वही कर रही थी.
परसों शब्बो आने वाली है, अपने बच्चो के साथ. उसने फिर कागज़ पे अपने कांपते हाथो से दोपहर के आगे कढ़ी लिख दिया. कितनी पसंद थी कढ़ी शब्बो को, शायद अब भी पसंद हो. वो इस बार कुछ भूलना नहीं चाहती थी शब्बो के आने पर, वैसे भी आजकल तो उसे कुछ याद ही नहीं रहता उसने धीरे से कागज़ कलम किनारे रखा और खिड़की से सर टिका कर एकदम शून्य हो, लगभग डूब चुके सूरज को देखने लगी. अब अँधेरा होने लगा था. एक हल्का सा झोंका आया और वो कागज़ उड़ ज़मीन पे गिर गया. उसने धीरे से अपनी आँखे बंद की और गहरी सांस ली.
सूरज अब डूब चूका था...
January-2010
