Monday, 14 May 2018

ऐसे  कई  प्रश्न  थे  मेरे  मन  में  जिनके  जवाब  तुम्हारे  पास  थे  तो , पर ना ही  मैं  उन्हें  सुन्ना  चाहता  था  और  ना  ही  तुम  बोलना .

सवाल  थे  और  जवाब  भी ... और  फिर  थी  ज़िन्दगी , कुछ  चाहनाए और  कुछ  सपने ; जो  उन  सवालों  और  जवाबों  के  वजूद  को  पूर्णतः  नकार  के  अपने  ही  अंदाज़  में  चलते  चले  जाते  हैं .

दिख  रही  थी  मुझे  वो  अपरिहार्य  घडी , वह  क्षण  जब  कुछ  अनर्थ  होने  ही  वाला  था . उनको  भी  दिख  रही  थी  तेज़  रफ़्तार  से  अपनी  तरफ  बढ़ती  वह  गाडी . पर  कई  बार  रुकना  मुमकिन  नहीं  हो  पाता कबीर , वो  मुस्कराहट  और  आसुओं  के  बीच  से  बोले .

कई  बार  हम  समझदार  नहीं  होते ,  ज़िम्मेदार  नहीं  होते  और  जानते  हुए  भी  बढ़ते  हैं  दुर्घटना  की  तरफ .

How tragic things are at times. How I wish there were better way for things to be for me to be...